न्यूयॉर्क: अमेरिका के व्यापारिक इतिहास में एक अभूतपूर्व फैसला सुनाते हुए न्यूयॉर्क की एक संघीय अदालत ने कंपनियों को अरबों डॉलर के रिफंड का रास्ता साफ कर दिया है. ‘यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड’ के जज रिचर्ड ईटन ने बुधवार को आदेश दिया कि जिन कंपनियों ने पिछले साल ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए विवादित आयात शुल्क का भुगतान किया था, वे अब अपना पैसा वापस पाने की कानूनी रूप से हकदार हैं.
यह पूरा विवाद ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ (IEEPA) के तहत लगाए गए टैरिफ से जुड़ा है. दरअसल, 20 फरवरी को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में इन शुल्कों को असंवैधानिक करार दिया था. अदालत का तर्क था कि राष्ट्रपति के पास टैक्स लगाने की असीमित शक्तियां नहीं हैं; यह अधिकार केवल अमेरिकी संसद के पास सुरक्षित है. इसी निर्णय को लागू करते हुए जज ईटन ने स्पष्ट किया कि केवल मुकदमा करने वाली कंपनियां ही नहीं, बल्कि हर वह आयातक जिसने यह शुल्क चुकाया है, वह रिफंड का पात्र है.
अर्थव्यवस्था पर कितना बड़ा असर?
अनुमान है कि यह अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी वित्तीय वापसी प्रक्रियाओं में से एक होगी. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सरकार ने इन टैरिफ के जरिए दिसंबर 2025 तक लगभग 130 बिलियन डॉलर (करीब 12 लाख करोड़ रुपये) वसूले थे. अब रिफंड की यह कुल राशि बढ़कर 175 बिलियन डॉलर (लगभग 16.12 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच सकती है.
कंपनियों के लिए बड़ी राहत
यह मामला टेनेसी की एक मैन्युफैक्चरिंग कंपनी ‘एटमस फिल्ट्रेशन’ की याचिका पर सुनवाई के दौरान आया, लेकिन इसका दायरा अब देश की लगभग 3 लाख छोटी-बड़ी कंपनियों तक फैल गया है. बाश एंड लॉम्ब, डायसन और फेडेक्स जैसी बड़ी कंपनियों से लेकर हजारों छोटे व्यवसायों ने इस फैसले का स्वागत किया है. ‘वी पे द टैरिफ्स’ गठबंधन ने इसे छोटे व्यापारियों की नैतिक और आर्थिक जीत बताया है.
हालांकि अदालत ने रिफंड का आदेश दे दिया है, लेकिन इतनी बड़ी राशि को वापस करना प्रशासनिक रूप से एक बड़ी चुनौती है. जानकारों का कहना है कि अमेरिकी कस्टम विभाग (CBP) का वर्तमान सिस्टम छोटी-मोटी त्रुटियों के रिफंड के लिए बना है, इतने बड़े पैमाने पर भुगतान के लिए नहीं. इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन इस प्रक्रिया को रोकने या टालने के लिए ऊपरी अदालत में अपील भी कर सकता है. फिलहाल, जज ईटन ने प्रक्रिया को व्यवस्थित रखने के लिए इन सभी मामलों की सुनवाई खुद करने का निर्णय लिया है. अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह किस गति से कंपनियों का पैसा वापस लौटाती है.
