दिल्ली आबकारी नीति मामले(Delhi Excise Policy) में सीबीआई (CBI) ने निचली अदालत के फैसले को कानून के खिलाफ बताते हुए दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) में याचिका दाखिल की है। एजेंसी ने अदालत के सभी आरोपियों को बरी करने के आदेश को चुनौती दी है और मामले की पुनः समीक्षा की मांग की है। CBI का तर्क है कि निचली अदालत ने पर्याप्त साक्ष्यों और कानून की व्याख्या के बावजूद यह आदेश दिया, जो उचित नहीं है। मामले की अगली सुनवाई 9 मार्च को दिल्ली हाई कोर्ट में तय की गई है। इस केस की निगरानी और सुनवाई में उच्च न्यायालय यह तय करेगा कि आरोपियों की बरी करने का फैसला सही था या फिर CBI की याचिका मान्य की जाएगी।
दिल्ली आबकारी नीति मामले में सीबीआई (CBI) ने ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ 974 पन्नों की रिवीजन याचिका दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल की है। ट्रायल कोर्ट ने मामले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया था, लेकिन CBI का कहना है कि यह फैसला तथ्यों और कानून दोनों के लिहाज से गलत है। एजेंसी ने आरोप लगाया है कि 27 फरवरी को स्पेशल जज जितेंद्र सिंह ने आरोप तय करने के शुरुआती चरण में ही एक तरह से “मिनी ट्रायल” चला दिया। CBI के अनुसार, इस स्तर पर इतनी गहराई से साक्ष्यों की जांच करना कानूनन सही प्रक्रिया नहीं है।
CBI का कहना है कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का गलत आकलन किया और इस वजह से सभी आरोपियों को बरी करने का आदेश दिया गया। एजेंसी ने अदालत से अपील की है कि इस फैसले की समीक्षा की जाए और उचित कानूनी कार्रवाई की जाए।
जांच के तरीके पर उठाए सवाल
सीबीआई (CBI) ने ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल अपनी रिवीजन याचिका में कहा है कि निचली अदालत ने पूरे कथित साजिश मामले को समग्र रूप से देखने के बजाय अलग-अलग हिस्सों में बाँटकर परखा, जिससे एजेंसी के पूरे केस की सही तस्वीर सामने नहीं आ सकी। CBI ने यह भी आरोप लगाया है कि आरोप तय करने के चरण में अदालत का दायित्व केवल यह देखना था कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने विस्तृत विश्लेषण करते हुए अंतिम निष्कर्ष जैसा दृष्टिकोण अपनाया। एजेंसी का कहना है कि यह दृष्टिकोण कानूनन प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है और इस वजह से सभी आरोपियों को बरी करने का आदेश गलत तरीके से दिया गया।

