नई दिल्ली। पटियाला हाउस कोर्ट, नई दिल्ली ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े एक संवेदनशील मामले में आरोपी प्रभात कुमार चौरसिया को ज़मानत प्रदान कर दी है। यह मामला एफआईआर संख्या 232/2025 के अंतर्गत थाना स्पेशल सेल, नई दिल्ली में दर्ज किया गया था, जिसमें आरोपी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 61(2) एवं 152 के तहत आरोप लगाए गए थे।
अपर सत्र न्यायाधीश (ASJ-05) श्री सौरभ प्रताप सिंह लालेर ने 17 जनवरी 2026 को पारित अपने आदेश में कहा कि आरोपी के विरुद्ध इस स्तर पर कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, जिससे यह सिद्ध हो कि उसने किसी विदेशी एजेंसी से संपर्क किया हो या किसी राष्ट्र-विरोधी गतिविधि में जानबूझकर संलिप्तता दिखाई हो।
बचाव पक्ष की दलीलें
आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुमित भारद्वाज, जिनकी सहायक अधिवक्ता ऋषि एवं अधिवक्ता ऋषिका अरोड़ा ने की, ने अदालत के समक्ष प्रभावी ढंग से यह तर्क रखा कि आरोपी को झूठा फँसाया गया है। बचाव पक्ष ने दलील दी कि सिम कार्ड bona fide व्यावसायिक उद्देश्य से लिए गए थे और आरोपी ने स्वयं कभी उनका अवैध उपयोग नहीं किया। बचाव पक्ष ने यह भी रेखांकित किया कि:
आरोपी के पास से कोई भी आपत्तिजनक सामग्री या उपकरण बरामद नहीं हुए; किसी विदेशी एजेंसी से सीधे संपर्क का कोई प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं है; आरोपी समाज में गहरी जड़ें रखता है, परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य है और उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
अदालत के महत्वपूर्ण अवलोकन अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि:जांच लगभग पूर्ण हो चुकी है और आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है; आरोपी से आगे किसी प्रकार की बरामदगी शेष नहीं है;
मात्र इस आधार पर कि सिम कार्ड आरोपी के नाम पर थे, उसे लंबे समय तक हिरासत में रखना उचित नहीं होगा।
अदालत ने यह भी माना कि आरोपी पिछले लगभग साढ़े चार महीनों से न्यायिक हिरासत में है और ऐसी स्थिति में लंबी विचाराधीन कैद सज़ा के समान होगी। ज़मानत की शर्तें अदालत ने आरोपी को ₹50,000 के निजी मुचलके एवं समान राशि की दो ज़मानतों पर रिहा करने का आदेश दिया, जिनमें से एक ज़मानत उसकी पत्नी द्वारा दी जाएगी। साथ ही आरोपी को निर्देश दिया गया कि वह जांच अधिकारी को अपना सक्रिय मोबाइल नंबर उपलब्ध कराए, साक्ष्यों से छेड़छाड़ न करे तथा बिना पूर्व अनुमति के देश से बाहर न जाए। निष्कर्ष – अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियाँ मामले के गुण-दोष पर अंतिम राय नहीं मानी जाएंगी। ज़मानत आदेश के साथ ही आवेदन का निस्तारण कर दिया गया।
यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहाँ गंभीर आरोपों के बावजूद प्रत्यक्ष साक्ष्यों के अभाव में आरोपी को न्यायिक संरक्षण प्रदान किया जाता है।
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