दिनांक 31.7.24 को हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा वर्तमान समय मे प्रेमचंद की प्रासंगिकता विषय पर श्रीमती ममता कालिया की अध्यक्षता में संगोष्ठी का आयोजन तथा अकादमी द्वारा प्रकाशित पुस्तक प्रेमचंद कृत ’निर्मला’ का विमोचन भी किया गया। मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. कुमुद शर्मा, उपाध्यक्ष, साहित्य अकादमी उपस्थित रहीं। वक्ताओं के रूप में इग्नू के डॉ. जितेंद्र श्रीवास्तव, डॉ. अजय नावरिया व श्री अंशु कुमार चौधरी ने अपने वक्तव्य प्रस्तुत किए।
अकादमी के सचिव श्री संजय कुमार गर्ग ने कार्यक्रम का आरंभ करते हुए कहा कि प्रेमचंद ने अपनी पुस्तकों में स्त्रियों के उत्थान, उनकी शिक्षा आदि पर ज़ोर दिया जिनकी प्रासंगिकता आज भी है। प्रकाशन विभाग में नयी पुस्तकों को जोड़ा गया है और पुरानी पुस्तकों का पुनः प्रकाशन किया गया है । इसी कड़ी में महान साहित्यकार श्री प्रेमचंद जी के सुप्रसिद्ध उपन्यास निर्मला का नाट्य रूपांतर किया गया जिसके लिए में नाटककार श्री सुरेन्द्र शर्मा का धन्यवाद करना चाहूँगा। आगे भविष्य में भी इसी प्रकार की पुस्तकों का प्रकाशन किया जाएगा। कार्यक्रम में आने की स्वीकृति प्रदान करने के लिए अध्यक्ष, मुख्य अतिथि तथा सभी वक्ताओं का आभार व्यक्त किया।
श्रीमती ममता कलिया ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा, प्रेमचंद वो लेखक थे जो जीवन से सट के चलते थे। आँख खोलने वाले निबंध लिखे। उनकी कहानियों, उपन्यासों में जीवन का सार मिलता है। प्रेमचन्द का लेखन में सार्वभौमिकता सुलभता मिलती है। प्रेमचंद को पढ़ने से जीना आता है। मुख्य अतिथि डॉ. कुमुद शर्मा ने प्रेमचंद की पत्रकारिता पर बात की। प्रेमचंद ने उस समय पत्रकारिता की जब स्वाधीनता को पाने की कल्पना थी। उर्दू पत्र जमाना से आरंभ किया। उनकी रचनाएं युवाओं को स्वाधीनता और संघर्ष के लिए तैयार करती थीं । श्री जितेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा, प्रेमचंद ने पारिवारिक मूल्यों को ऊपर रखा। ग़बन कहानी में पति की सम्पत्ति में पत्नी का अधिकार दिखाया। स्त्रियों की शिक्षा, विधवा विवाह आदि बिंदुओं पर आज से 100 वर्ष पहले लिखा जो आज प्रासंगिक हैं। वो ऐसे राष्ट्र की कल्पना करते थे जिसमें कोई भेदभाव ना हो । सबको बराबरी का मोका मिलना चाहिए। श्री अजय नावरिया ने अपने वक्तव्य में कहा, अगर अभी भी प्रेमचंद के साहित्य में अभी भी प्रासंगिकता ढूँढी जा रही है तो इसका अर्थ है की समाज ने अभी भी उन्नति नहीं की है। जबकि उन्होंने इतने वर्षों पहले सामाजिक विडम्बनाओं पर लिखा । दलित विमर्श और स्त्री विमर्श को उस समय लिखा जब कोई लेखक नहीं लिखता था। प्रेमचंद के साहित्य में युवावों के लिए संदेश दिया है की कर्तव्यनिष्ठता, ईमानदारी और सहायता का जज़बा होना चाहिए। शोधार्थी श्री अंशु कुमार चौधरी ने प्रेमचंद के बाल साहित्य पर बात की। प्रेमचंद के बाल साहित्य में हर वर्ग के बालकों के लिए लेखन किया है । शैशव, बाल एवं किशोर। बच्चों के अंदर संवेदना, उनकी समझ, नैतिक मूल्यों एवं मानवीयता, देशप्रेम की भावना उनके बाल साहित्य में दिखती है। ईदगाह कहानी में इसको देखा जा सकता है। जिसकी प्रासंगिकता आज के समय में भी है। पुस्तक विमोचन करते हुए नाटककार श्री सुरेन्द्र शर्मा ने कहा की निर्मला का नाट्य रूपांतर करना एक चुनौती भरा काम था जो सार्थक हुआ। कार्यक्रम के अंत में अकादमी के उपसचिव श्री ऋषि कुमार शर्मा ने अपने धन्यवाद ज्ञापन सभी वक्ताओं व श्री सुरेंद्र शर्मा का धन्यवाद करते हुए कहा कि प्रत्येक को प्रेमचंद को अवश्य पढ़ना चाहिए। हिन्दी अकादमी सदा हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए तत्पर हैं। हम चाहते हैं कि अधिक से अधिक हिन्दी प्रेमी सभी कार्यक्रमों के माध्यम से हिन्दी अकादमी से जुड़े।
अकादमी के सचिव श्री संजय कुमार गर्ग ने कार्यक्रम का आरंभ करते हुए कहा कि प्रेमचंद ने अपनी पुस्तकों में स्त्रियों के उत्थान, उनकी शिक्षा आदि पर ज़ोर दिया जिनकी प्रासंगिकता आज भी है। प्रकाशन विभाग में नयी पुस्तकों को जोड़ा गया है और पुरानी पुस्तकों का पुनः प्रकाशन किया गया है । इसी कड़ी में महान साहित्यकार श्री प्रेमचंद जी के सुप्रसिद्ध उपन्यास निर्मला का नाट्य रूपांतर किया गया जिसके लिए में नाटककार श्री सुरेन्द्र शर्मा का धन्यवाद करना चाहूँगा। आगे भविष्य में भी इसी प्रकार की पुस्तकों का प्रकाशन किया जाएगा। कार्यक्रम में आने की स्वीकृति प्रदान करने के लिए अध्यक्ष, मुख्य अतिथि तथा सभी वक्ताओं का आभार व्यक्त किया।
श्रीमती ममता कलिया ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा, प्रेमचंद वो लेखक थे जो जीवन से सट के चलते थे। आँख खोलने वाले निबंध लिखे। उनकी कहानियों, उपन्यासों में जीवन का सार मिलता है। प्रेमचन्द का लेखन में सार्वभौमिकता सुलभता मिलती है। प्रेमचंद को पढ़ने से जीना आता है। मुख्य अतिथि डॉ. कुमुद शर्मा ने प्रेमचंद की पत्रकारिता पर बात की। प्रेमचंद ने उस समय पत्रकारिता की जब स्वाधीनता को पाने की कल्पना थी। उर्दू पत्र जमाना से आरंभ किया। उनकी रचनाएं युवाओं को स्वाधीनता और संघर्ष के लिए तैयार करती थीं । श्री जितेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा, प्रेमचंद ने पारिवारिक मूल्यों को ऊपर रखा। ग़बन कहानी में पति की सम्पत्ति में पत्नी का अधिकार दिखाया। स्त्रियों की शिक्षा, विधवा विवाह आदि बिंदुओं पर आज से 100 वर्ष पहले लिखा जो आज प्रासंगिक हैं। वो ऐसे राष्ट्र की कल्पना करते थे जिसमें कोई भेदभाव ना हो । सबको बराबरी का मोका मिलना चाहिए। श्री अजय नावरिया ने अपने वक्तव्य में कहा, अगर अभी भी प्रेमचंद के साहित्य में अभी भी प्रासंगिकता ढूँढी जा रही है तो इसका अर्थ है की समाज ने अभी भी उन्नति नहीं की है। जबकि उन्होंने इतने वर्षों पहले सामाजिक विडम्बनाओं पर लिखा । दलित विमर्श और स्त्री विमर्श को उस समय लिखा जब कोई लेखक नहीं लिखता था। प्रेमचंद के साहित्य में युवावों के लिए संदेश दिया है की कर्तव्यनिष्ठता, ईमानदारी और सहायता का जज़बा होना चाहिए। शोधार्थी श्री अंशु कुमार चौधरी ने प्रेमचंद के बाल साहित्य पर बात की। प्रेमचंद के बाल साहित्य में हर वर्ग के बालकों के लिए लेखन किया है । शैशव, बाल एवं किशोर। बच्चों के अंदर संवेदना, उनकी समझ, नैतिक मूल्यों एवं मानवीयता, देशप्रेम की भावना उनके बाल साहित्य में दिखती है। ईदगाह कहानी में इसको देखा जा सकता है। जिसकी प्रासंगिकता आज के समय में भी है। पुस्तक विमोचन करते हुए नाटककार श्री सुरेन्द्र शर्मा ने कहा की निर्मला का नाट्य रूपांतर करना एक चुनौती भरा काम था जो सार्थक हुआ। कार्यक्रम के अंत में अकादमी के उपसचिव श्री ऋषि कुमार शर्मा ने अपने धन्यवाद ज्ञापन सभी वक्ताओं व श्री सुरेंद्र शर्मा का धन्यवाद करते हुए कहा कि प्रत्येक को प्रेमचंद को अवश्य पढ़ना चाहिए। हिन्दी अकादमी सदा हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए तत्पर हैं। हम चाहते हैं कि अधिक से अधिक हिन्दी प्रेमी सभी कार्यक्रमों के माध्यम से हिन्दी अकादमी से जुड़े।
