चंद्रमा बहुत सुंदर था। उसकी सुंदरता के चर्चे सर्वत्र होते थे। चंद्रमा की सुंदरता पर मोहित होकर दक्ष प्रजापति की सत्ताइस पुत्रियों ने उससे विवाह कर लिया था। कुछ दिन हंसी-खुशी में व्यतीत हुए फिर चन्द्रमा रोहिणी को छोड़कर शेष पत्नियों से नाराज रहने लगा। एक दिन तो उसने हद ही कर दी। रोहिणी को छोड़कर शेष पत्नियों को उसने महल से निकाल दिया। अपमानित दक्ष पुत्रियों ने मायके जाकर अपने पिता दक्ष प्रजापति से रो-रोकर अपनी व्यथा सुनाई। दक्ष ने चन्द्रमा को बुलाकर समझाया पर चन्द्रमा नहीं माना। उसने दक्ष प्रजापति को उल्टे बहुत भला-बुरा कहा। इस पर दक्ष प्रजापति को गुस्सा आ गया। उन्होंने चन्द्रमा को शाप दे दिया- ‘तुम्हें अपने रूप-सौंदर्य का बड़ा गर्व है, जा तुझे क्षय रोग हो जाएगा। तू- कांतिहीन हो जाएगा। दक्ष के शाप से छुटकारे के लिए चन्द्रमा ने भोले शंकर भगवान शिव की कठोर तपस्या की। शिव प्रसन्न हुए और चन्द्रमा से वर मांगने को कहा। चन्द्रमा ने शिव को सारी घटना बताई और श्राप से मुक्त होने का वर मांगा।
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