देवों के देव महादेव, भूतभावन, व्योमकेष, जीवों का परम कल्याण करने वाले भगवान आषुतोश भोले भंडारी के परम उत्सव पर अपनी लेखनी को पवित्र करने का लेख संवरण नहीं कर पा रहा हूं। शिवरात्रि हिन्दुओं के सबसे पवित्र त्योहारों मे से एक है। शिव ही समस्त सृष्टि के स्वामी हैं। भूतभावन भगवान शंकर ही इस चराचर जगत के समस्त प्राणियों (मनुश्य, पशु, पक्षी, देव, दानव) को इस धरा पर अस्तित्व प्रदान करते हैं। वे ही आदि हैं और वे ही अंत हैं। भूत का तात्पर्य केवल भूत-प्रेत आत्माओं से नहीं है, बल्कि भूत का मूल अर्थ, जो इस धरा पर उत्पन्न हुआ है, अर्थात पंचभूत से बना हर जीव भूत है। भावनः का तात्पर्य है-इनका पालन करने वाला एवं इनका कल्याण करने वाला।बाबा विश्वनाथ के इस पर्व को मनाने के पीछे कई कथाएं प्रचलित हैं। शिव पुराण में महाशिवरात्रि का विस्तार से वर्णन किया गया है। शिव पुराण के रुद्र संहिता (पार्वती खंड) में भगवान शिव के पार्वती से विवाह उत्सव का वर्णन मिलता है। बसंत पंचमी के बाद आने वाला यह पर्व प्रकृति के अत्यंत सुंदर मनभावन स्वरूप के समय मनाया जाता है। यहां शिव को चेतना एवं शक्ति को ऊर्जा (शक्ति) के योग का उत्सव भी माना जाता है। शिवरात्रि में आध्यात्मिक रूप यदि देखा जाए तो शिव का अर्थ है- कल्याण और रात्रि का अर्थ है विश्राम अथवा अंधकार। महाशिवरात्रि का यह पर्व अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर आत्मज्ञान के प्रकाश की और बढ़ने के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।
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